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“आइनाघर ”


संगमनकार में प्रियंवद का कॉलम
 आइनाघर ”  -----

       हमने अपनी वेबसाइट में वरिष्ठ साहित्यकार व अकार के संपादक प्रियंवद का कॉलम “आइनाघर ” शुरु किया है। इस कॉलम में विगत वर्षों में उनके द्वारा लिखी गई रम्य रचनाएं पुनः प्रकाशित की जा रही हैं । ये रम्य रचनाएं विगत लम्बे अरसे के दौरान लिखी गई हैं। ये एक पूरे दौर के महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं और सभी के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं । इस बीच एक लंबा अरसा गुजर चुका है, एक पूरी नई पीढ़ी सामने है जो संभवतः इन महत्वपूर्ण रचनाओं से लगभग अनभिज्ञ है । इन लेखों में साहित्यिक, राजनैतिक , सामाजिक एवं विभिन्न मसलों पर काफी गंभीर ,रोचक व संग्रहणीय विचार, विमर्श व वार्तालाप हैं । ये आज भी उतने ही सामयिक व प्रासंगिक हैं तथा उम्मीद करते हैं कि यह नई पीढ़ी के लिए काफी उपयोगी व जानकारीपरक साबित होंगी । हमारी यह भी  कोशिश होगी कि बीच बीच में वे कुछ नई रचनाएं भी उपलब्ध कराते रहते हैं ।

आइनाघर – 10

           इस बार धर्म का इतिहास लिखे जाने पर अपनी बात कह रहे हैं प्रियंवद। उनका कहना है कि धर्म के नाम पर जितना रक्तपात हुआ उतना राज्य सत्ताओं के संघर्ष में नहीं हुआ है । धर्मों का इतिहास लिखा जाना हमें इसकी गलत व्याख्याओं से मुक्त करके दर्शन के सिद्धातों तक जाने का अवसर देगा । यह आलेख हाल ही में नवभारत टाइम्स मुंबई में प्रकाशित हुआ है । पढ़कर प्रतिक्रिया दें ।  

                                                                          जीवेश प्रभाकर

       संपादक- संगमनकार

हमारे पास धर्म हैं, पर उन धर्मों का इतिहास नहीं है। इतिहास के नाम पर जो कुछ है, वह धर्म के फलने फूलने तथा उसकी स्तुति के अप्रामाणिक किस्से हैं। धर्म युद्धों में जितने प्राण गए हैं, उतने राज्य युद्धों में नहीं। मनुष्य के प्रति जितनी नफरत, हिंसा, दमन और शोषण धर्मों ने किया है, किसी अन्य सत्ता ने नहीं। यदि धर्मों का इतिहास लिखा गया होता, तो हर धर्म की इस सच्चाई के बारे में भी लिखा जाता और तब धर्म के बर्बर जगत या द्वीप नहीं होते। इतिहास तर्क, विवेचना, तथ्य, संवाद और बहस को जन्म देता है। उसके लिए स्पेस बनाता है। चीजों को पारदर्शी करता है। अज्ञानता से जन्मा भय और अंधविश्वास से जन्मी क्रूरता को नष्ट करता है।……

 

प्रियंवद

 

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