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“आइनाघर ”


संगमनकार में प्रियंवद का कॉलम
 आइनाघर ”  -----

       हमने अपनी वेबसाइट में वरिष्ठ साहित्यकार व अकार के संपादक प्रियंवद का कॉलम आइनाघर ” शुरु किया है  जो पाक्षिक है और प्रतिमाह के पहले व तीसरे हफ्ते में वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाता है।

 इस कॉलम में विगत वर्षों में उनके द्वारा लिखी गई रम्य रचनाएं पुनः प्रकाशित की जा रही हैं । ये रम्य रचनाएं विगत लम्बे अरसे के दौरान लिखी गई हैं। ये एक पूरे दौर के महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं और सभी के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं । इस बीच एक लंबा अरसा गुजर चुका है, एक पूरी नई पीढ़ी सामने है जो संभवतः इन महत्वपूर्ण रचनाओं से लगभग अनभिज्ञ है । इन लेखों में साहित्यिक, राजनैतिक , सामाजिक एवं विभिन्न मसलों पर काफी गंभीर ,रोचक व संग्रहणीय विचार, विमर्श व वार्तालाप हैं । ये आज भी उतने ही सामयिक व प्रासंगिक हैं तथा उम्मीद करते हैं कि यह नई पीढ़ी के लिए काफी उपयोगी व जानकारीपरक साबित होंगी । हमारी यह भी  कोशिश होगी कि बीच बीच में वे कुछ नई रचनाएं भी उपलब्ध कराएं ।

इस बार आइनाघर – 7 में  एक लेखक उसकी रचनाओं सेअपने संबंधों पर बात कर रहे हैं । एक अंतराल के बाद अपनी रचनाओं का आत्मावलोकन एवं उसको महसूस करना एक अलग अनुभव है । रचनाओं से जीवनपर्यंत भावात्मक लगाव व उसके बाद भी उसके अस्तित्व उसकी सार्थकता पर एक सारगर्भित आलेख । 

 

जीवेश प्रभाकर

संपादक- संगमनकार 

 

आइनाघर - 7

.....जिस तरह मनुष्य के जीवन में उसका अन्य मनुष्यों के साथ संबंध होता हैलगभग उसी तरहउसी स्तर परलेखक का अपनी रचनाओं के साथ संबंध होता है। अपनी कहानिय़ों के जन्म से आज तकमेरा उनसे कितना प्रगाढ़अंतरंग और जीवंत संबंध रहा हैइस पर पहले कभी सोचा नहीं था। समय बीतने के साथ पुरानी कहानियों  से अब कितनी संलग्नता शेष रह गई है और कितना कुछ विस्मृत हो गया हैइस पर भी ध्यान नहीं दिया था। पर आज जब सोच रहा हूँतो लगता है अपनी कहानियों से मेरा संबंध लगभग उसी तरह जटिल व अपरिभाषेय हैजिस तरह जीवन के अन्य संबंध हैं। इस नूतन भावबोध और विचार ने रचनात्मक संबन्धों की इन गुत्थियों में प्रवेश करने की उत्तेजना और उत्सुकता तथा समझने की जिज्ञासा बढ़ा दी है।

       कहानियों से यह संबंध जीवन भर तो शरण देता ही हैमृत्यु के बाद भी यह मुझे सहेजे रहेगा। यह एक विलक्षण उपलब्धि और अकल्पनीय स्थिति है।  जीवन के अन्य किसी संबंध में यह संभव नहीं है। काया खत्म होते ही संबंध भी खत्म हो जाते हैं। पर कहानी के साथ यह नहीं होता। यदि कहानी बाद में जीवित रह जाती हैतो काया विहीन मैं भी उसमें जीवित रहता हूँ। उसका अस्तित्व मेरा अस्तित्व भी होता है। । किसी भी संबंध की गरिमानिष्ठासार्थकताउपलब्धि और अमरता का यह सर्वोत्कृष्ट आख्यान है जो मेरे और मेरी कहानी के सम्बन्धों में अनंत ऊर्जा और उल्लास के साथ उद्धोषित है कि मृत्यु तक मैं कहानी रचता हूँमृत्यु के बाद कहानी मुझे रचेगा ।.....

(प्रियंवद)

 

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