• flash-1.jpg
  • flash-5.jpg

“आइनाघर ”


संगमनकार में प्रियंवद का कॉलम
 आइनाघर ”  -----

       हमने अपनी वेबसाइट में वरिष्ठ साहित्यकार व अकार के संपादक प्रियंवद का कॉलम “आइनाघर ” शुरु किया है। इस कॉलम में विगत वर्षों में उनके द्वारा लिखी गई रम्य रचनाएं पुनः प्रकाशित की जा रही हैं । ये रम्य रचनाएं विगत लम्बे अरसे के दौरान लिखी गई हैं। ये एक पूरे दौर के महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं और सभी के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं । इस बीच एक लंबा अरसा गुजर चुका है, एक पूरी नई पीढ़ी सामने है जो संभवतः इन महत्वपूर्ण रचनाओं से लगभग अनभिज्ञ है । इन लेखों में साहित्यिक, राजनैतिक , सामाजिक एवं विभिन्न मसलों पर काफी गंभीर ,रोचक व संग्रहणीय विचार, विमर्श व वार्तालाप हैं । ये आज भी उतने ही सामयिक व प्रासंगिक हैं तथा उम्मीद करते हैं कि यह नई पीढ़ी के लिए काफी उपयोगी व जानकारीपरक साबित होंगी । हमारी यह भी  कोशिश होगी कि बीच बीच में वे कुछ नई रचनाएं भी उपलब्ध कराते रहते हैं ।

 इस बार आइनाघर – 9 मेंहम उनके पूर्व प्रकाशित उपन्यास वे वहां कैद हैं के नए संस्करण की भूमिका प्रकाशित कर रहे हैं । भूमिका आज के संदर्भ में अत्यंत मौजूं हैं जो हमें सोचने पर मजबूर करती है । यह उपन्यास 1990 में पहली बार प्रकाशित हुआ था । फिर अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार के दौरान 2001 में इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ और अब उपन्यास का नया संस्करण जब केन्द्र में भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सत्तासीन है। इन 27 वर्षों के दरम्यान इस उपन्यास में वर्णित पूरी आशंकाएं , संभावनाएं लगातार घटित होते दिखती रही हैं और सवाल वहीं हैं । पढ़कर अपनी टिप्पणी दें तो अच्छा लगेगा ।

 

जीवेश प्रभाकर

 संपादक- संगमनकार 

 

आइनाघर – 9

पुनश्च....

  

.....वास्तव में राज्य ,धर्म और पूंजी के गहरे ,अंतरंग संबंध हैं। एक के अस्तित्व से दूसरे का आस्तित्व है। एक पर संकट आता है तो दूसरा तत्काल उसकी रक्षा के लिएसन्नद्हो जाता है ।यह सब भी किसी तर्क, सिद्धान्त या छद्मम महानता के आवरण में किया जाता है। इन तीनों संस्थाओं का एकमात्र उद्देश्य मनुष्य को अपना गुलाम बना कर रखना है। इसलिए ये सदैव संगठित रूप से मनुष्य की आंशिक स्वतन्त्रता की भी विरोधी होती हैं। मनुष्य की स्वतन्त्रता की कामना व बोध एक उन्नत ,जाग्रत चेतना से नाभिनाल बद्ध होता है । मनुष्य होने की चेतना भर ही इन सत्ताओं की निरंकुशता व अत्याचार से सीधे टकराती है, इसलिए कभी, कहीं, कोई भी रोशनी दिखने पर ,ये तत्काल उसे निगलने के लिए टूट पड़ते हैं। इसीलिए ये दार्शनिकों ,लेखकों ,विचारकों, क्रांतिकारियों ,पुस्तकों की हत्यांए करते हैं। नए विचारों को ,परिवर्तनों को भ्रूण अवस्था में ही मार देने पर i विश्वास करते हैं। इन्होंने हमेशा कभी अकेले, कभी मिल कर मुक्ति के प्रयासों की हत्यांए की हैं। इसमें भी ,तीनों मे धर्म सबसे ऊपर है। वह अपने द्वारा की गयी हत्या को भी महिमा मंडित करता है। इस ह्त्या को भी अनेकों के पुण्य व ईश्वरीय सत्ता को बचाने के लिए की गयी पापी की हत्या बताता है। मृत्यु के बाद मिलने वाले एक अलौकिक जगत, ईश्वर का सान्निघ्य ,दुखों से स्थायी मुक्ति या फिर निरंतर नर्क की यातना के भय, धर्म की सैंकड़ों सालों पहले लिखी पुस्तकें ,इसके अपने धर्म गुरु सब मिल कर एक ऐसा क्रूर मायाजाल बिछाते हैं जिसमें कसा हुआ अबोध ,निरीह, मजबूर व्यक्ति, जीवन भर मनुष्यता की सबसे निचली सीढ़ी पर रेंगता रहता है। पूंजी ऐसे धर्म को समृद्ध व भव्य करती रहती है, राज्य कानून बना कर उसे संरक्षण देता है। उसके विरुद्ध उठी आवाज को मृत्यु अथवा यातना देता है। ये तीनों सत्ताएं मनुष्य की स्थायी बेड़िया हैं। इनके साथ ही वह जन्म लेता है ,इनके साथ जीता है । सिर्फ मृत्यु के बाद इनसे मुक्ति पाता है। जिस समाज और राज्य में ,इन तीनों सत्ताओं के पास जितनी अधिक शक्तियाँ व अधिकार होते हैं, वह समाज और राज्य उतना ही निकृष्ट होता है। उसका मनुष्य उतना ही दमित ,पीड़ित और दुखी होता है। धार्मिक राष्ट्र की परिकल्पना ऐसे ही समाज और राज्य गढ़ने की है, जहां मनुष्य कुछ क्रूर हत्यारों और दँभी अज्ञानियों का गुलाम बना रहता है।

(प्रियंवद)

 

क्लिक करें--आइनाघर - 9