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संगमन के बारे में

'संगमन'ने बिना किन्हीं स्थाई ढाँचागत सुविधाओंके ही,विगत 25 वर्षों में विभिन्न विषयों पर विमर्श के 21  वार्षिक  आयोजन करके साहित्य व विचार की दुनियामें अपनी महत्वपूर्ण व स्वीकार्य पहचान बनाई है। इस संस्था का भौतिक स्वरूप एक ऐसे ढांचे से बना है जो सर्वथा नया और पारदर्शी है। . संस्था में किसी पदाधिकारी का न होना, इसका कोईबैनर न होना,इसका कोई बैंक एकाउंट न होना, इसकी कोई स्थाई या अस्थाई सम्पत्ति न होना संस्था को विशिष्ट ही नहीं, अद्भुत भी बनाते हैं। संस्था का यह प्रारूप तथा इसका आतंरिक प्रबन्धन इतना लचीला है कि इसे दुनिया के किसी भी हिस्से में आयोजितकिया जा सकता है। 1993 में कानपुर से आरम्भ होने वाली श्रंखला में यह विमर्श अब तक देश के 21 नगरों/महानगरों तक पहुँच चुका है। अक्टूबर 2015 में नागपुर में सम्पन्न21वें आयोजन केसाथ ही संगमन ने अपना स्वरूप व सरोकार विस्तृत करके,हिन्दीतर भाषाओं के साथ अन्तर्भाषायी विमर्श की तरफ भी क़दम बढ़ा दिए हैं। हमारे विगत आयोजनों में वर्ष 2015 तक, लगभग 400 से अधिक कथाकार,आलोचक,कवि, कलाकर्मी तथा विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय लोग अपनी प्रतिभागिता कर चुके हैं। जैसा कि प्रायः हर बड़े अनुष्ठान काप्रारम्भ बहुत छोटे स्तर पर ही हो पाता है,संगमन की शुरुआत भी इससे अलग नहीं थी। 1993  के संभवतः अप्रैल माह में गिरिराज किशोर, प्रियंवद,अमरीक सिंह दीप औरकमलेश भट्ट कमल सड़क मार्ग से कानपुर से रायबरेली जा रहे थे। उस यात्रा के दौरान ही मन में यह विचार आया कि लेखन पर बातचीत के लिए एक मंच क्यों न बनाया जाय, जिसमेंखास तौर पर युवा लेखकों की भागीदारी हो। फिर तो इसके प्रारूप और अन्य पक्षों पर पूरी गम्भीरता से मंथन शुरू हो गया। औपचारिक व पारम्परिक प्रारूप के बजाए,मंच को कितना ज़्यादा अनौपचारिक बनाया जा सके ,इस पर भी खूब विचार विमर्श हुआ। मंच की इस अनौपचारिकता के पीछे औपचारिक संस्थाओं में पद और वर्चस्व को लेकर होने वाली राजनीति तथा उद्देश्य से भटकने से बचने का उपक्रम मुख्य था। तय हुआ, कि मंच किसी औपचारिक संस्था के रूप में काम नहीं करेगा, न इसका कोई अध्यक्ष, न सचिव, और न ही कोई पदाधिकारी होगा। तमाम संस्थाओं में पैसे के लिए होने होने वाली कटुता और वैमनस्य से बचने के लिए यह भी तय हुआ, कि मंच का कोई बैंक एकाउंट और कोष भी नहीं होगा। मंच से जुड़े लोग ही अपना अंशदान देंगे और साहित्य,कला या अन्य सामाजिक प्रतिबद्धताओं के  प्रति निष्ठावान लोगों से ही यथासंभव आयोजन के लिए सहयोग लिया जाएगा। आयोजन वार्षिक  होगा और किसी भी शहर में आयोजित किया जा सकेगा। आयोजन में स्थानीय पर्यटन को भी अनिवार्य रूप से शामिल करने पर सहमति बनी।  

         आयोजन के दौरान कार्यक्रमों कोभी अधिकाधिक अनौपचरिक रखने का निर्णय लिया गया । तय हुआ कि उनमे न कोई अध्यक्ष और मुख्य अतिथि आदि होगा, न ही फूल- माला और दीप-प्रज्वलन, विमोचन, सरस्वती वन्दना जैसी  औपचारिकताएँ ही होंगी इतना ही नहीं,मंच का कोई पदाधिकारी संवाद सत्रों में चलने वाली बहसों में कोई हस्तक्षेप या उपस्थिति भी दर्ज़ नहीं कराएगा।संगमन की तरफ से केवल  गिरिराज जी संगमन का समापन करते हुए अपनी तथा पूरे आयोजन की बातचीत को समेटते हुए बात रखेंगे। इसे पिछले कुछ संगमनों में बदल दिया गया, क्योंकि हमारे परिवार में कई प्रतिष्ठित लेखक रहे हैं और लोग उनके विचार जानने से वंचित रह जाते थे। प्रसन्नता की बात है कि इस मंच नेअपनी इन अवधारणाओं का पालन पिछले 21 आयोजनों में किया है। मंच ने वैचारिक स्तर पर  भी पूरा खुलापन रखा है। किसी संस्था अथवा व्यक्ति द्वारा स्वयं को इस्तेमाल कर लिए जाने सेअपने को पूरी तरह बचाया है। संगमन के चारों संस्थापक सदस्य इसकी नींव के पत्थर हैं। बीच बीच में संगमन कुछ साहित्यकारों को संस्था की शर्तों पर अपने साथ जोड़ता रहा है। इनमें से कुछ  साहित्यिक मित्र अपने-अपने कारणो से अलग भी होते रहे हैं। संस्था ऐसे लोगों कीआभारी है जिन्होंने समय समय पर उसे ताकत और सामूहिकता प्रदान करने में अपना अमूल्य सहयोग दियाया दे रहे हैं। इस वेबसाइट में संगमन -22 के अंतर्गत वर्तमान संगमन परिवार का विवरण दिया गया है। संगमन परिवार की पारस्परिक आत्मीयता, सक्रियता व सहयोग ही संगमन का मुख्य आधार है। हमें विश्वास है कि भविष्य में हमारा परिवार बड़ा होता जाएगा।  
   
      पिछले 15-16 आयोजनों तक संस्था प्रतिभागियों को मार्गव्यय देती रही है। बाद मेंआर्थिक कठनाइयों के चलते यह तय किया गया कि प्रतिभागियों से अनुरोध किया जाए कि मार्ग व्यय वे वहन करें। इस तरह बची राशि को संगमन स्थानीय संयोजक को दे, जिससे वह अपने दायित्व को अधिक सुगमता व सुविधा से पूरा कर सके। यह संस्था के लिए बेहद गर्व का विषय है कि हमारे प्रतिभागी अब  अपने खर्चों पर शामिल होकर संगमन के आयोजनों को पहले की ही तरह सफल बना रहे हैं। इस परिवर्तन के बाद देखा जाए तो संगमन अब पूरी तरह एक सहकारी आयोजन का रूप ले चुका है। इसमें संस्थापकों और संगमन-टीम में शामिल अन्य सदस्यों के साथ ही स्थानीय संयोजक तथा सभी प्रतिभागियों की प्रत्येक स्तर पर, प्रत्येक रूप में प्रत्यक्ष-प्ररोक्ष सहभागिता होती है।

     शुरू के दो संगमन कानपुर में हुए। एक बेहद छोटे व मामूली स्कूल के फर्श पर प्रतिभागियों को सुलाया गया था। न्यूनतम साधनों के साथ इन दो आयोजनों में हमने संगमन के आधारभूत नियम व स्वरूप व्यवहार रूप में लगभग सुनिश्चित कर लिए थे। इसके बाद संगमन को कानपुर से बाहर निकाल कर देश के विभिन्न हिस्सों में ले जाया गया। प्रत्येक नए शहर में हमें एक स्थानीय संयोजक मिला जिसने संगमन के प्रतिभागियों के रहने व भोजन आदि कि व्यवस्था का दायित्व उठाया। इस तरह संगमन की यह यात्रा व स्वरूप चल निकला । वेबसाइट में संगमन यात्रा के कालम में अब तक के 21 आयोजनों के समस्त विवरण विस्तार से दिए गए हैं ।

       आज संगमन एक सहकारी मंच के रूप में रचनात्मक व बौद्धिक हस्तक्षेप का सहकारी उपक्रम है। इसके तीन प्रमुख अंग हैं। संगमन, स्थानीय संयोजक व प्रतिभागी । आर्थिक व्यय संगमन व स्थानीय संयोजक अपने स्त्रोतों से करते हैं । संगमन परिवार के सदस्य अपना अपना सहयोग दे कर संगमन की आर्थिक जरूरतों को पूरा करते हैं। स्थानीय संयोजक अपने स्तर पर अपने दायित्व के साधन जुटाता है जिसमे भोजन, आवास तथा सभागृह मुख्य हैं। प्रतिभागी अपनी यात्रा का खर्च स्वयं उठाते हैं, यह उनका सहयोग है। चंदेरी के संगमन में विधाओं की परिधि को तोड़ने के बाद, नागपुर में हमने भाषाओं की सीमाओं को भी तोड़ा है। मराठी व हिन्दी के लेखकों के समन्वित विमर्श ने संगमन को रचनात्मक व बौद्धिक हस्तक्षेप का प्रभावी, सार्थक व उद्देश्यपूरक मंच बना दिया है।

      हमारे पास संगमन की विपुल सामाग्री थी जो हमारी वेबसाइट पर पड़ी थी। किन्हीं कारणों से कुछ समय पहले वेबसाइट अचानक गायब हो गयी। हमने उसे दुबारा जब प्राप्त किया तो बहुत सामग्री अभी तक नहीं मिल पायी है। जो मिल सकी वह वेबसाइट पर है। फिर भी, इसमे समस्त 21 संगमन के बारे में काफी जानकारी है। हम प्रयास कर रहे हैं कि हम सम्पूर्ण सामाग्री पुनः प्राप्त करके उसे प्रस्तुत कर सकें। संगमन-22 की विस्तृत जानकारी आयोजन के पश्चात प्रस्तुत की जाएगी।                                                                                                    

 

 

 

                                                     प्रियंवद

मो. 9839215236