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संगमन-२१

 संगमन-२१ 

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2-3-4 अक्टूबर 2015

नागपुर, महाराष्ट्र

 

विषय - रचनात्मकता और प्रतिरोध : पारस्परिक रूपान्तरण के आयाम

सृजन किसी भी कला का केन्द्र बिन्दु होता है और प्रतिरोध उसका मूल स्वभाव. एक रचनाकार या कि कलाकार, जब भी रचाव की प्रक्रिया में डूबता है तो वह किसी न किसी स्थापित ग्रंथि अथवा सत्ता के विरुद्ध नाकहते हुए उसका एक विकल्प प्रस्तुत कर रहा होता है. इस तरह रचना और प्रतिरोध एक दूसरे के समानार्थी और कई अर्थों में एक दूसरे के पूरक भी हैं क्योंकि दोनों ही एक दूसरे की दुनिया में निरंतर आवाजाही करते हैं. न केवल आवाजाही, बल्कि एक दूसरे को प्रभावित भी करते हैं और उससे दिशा भी पाते हैं. कह सकते हैं कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में प्रतिरोध का रचनात्मकता के साथ घनिष्ठ संबंध है. लेकिन इसका कोई अंतिम और स्थायी नियम नहीं है. यह बहुत कुछ रचनाकार के स्वभाव और उसकी प्रकृति पर निर्भर करता है.

यहाँ सवाल ज़रूर उठ सकता है कि क्या सचमुच प्रतिरोध रचना का मूल स्वर होता है? यदि हाँ तो इसकी प्रक्रिया कैसे घटित होती है? प्रतिरोध रचना को कैसे जन्म देता है या रचना प्रतिरोध में कैसे रूपांतरित होती है? सामाजिक संरचनाओं या विभिन्न शक्ति केन्द्रों के प्रतिरोध में रचनात्मकता किस तरह सृजित या कि प्रभावित होती है? साथ ही भिन्न-भिन्न भाषायी-समुदाय में उसकी प्रकृति बदलती है या अपरिवर्तित रहती है? समाज की दीर्घकालीन प्रबोधन की प्रक्रिया और वैश्विक प्रयोगों से उसका संबंध कैसे अपने कलात्मक आयामों को हासिल करता है

आज वैश्विक रूप में हम जिस तरह की सभ्यता के बीच खड़े हैं उसमें एक रचनाकार का दायित्व पहले की तुलना में कहीं अधिक गंभीर और चुनौतीपूर्ण है. ऐसे में सतत संवाद ही वह आयाम है जो प्रतिरोध और रचनात्मकता के पारस्परिक रूपांतरण को नए रूप में तलाश सकता है. संवाद न केवल रचनाकार और समाज की विभिन्न संस्थाओं के बीच ज़रूरी है बल्कि विभिन्न भाषायी-समाज की सक्रियता और कलात्मक विशिष्टता के बीच भी ज़रूरी है.  

ऐसे ही कुछ सवालों और उद्देश्यों को केन्द्र में रखते हुए संगमन का यह 21 वाँ आयोजन नागपुर (महाराष्ट्र) में किया जा रहा है. ताकि हिन्दी और मराठी की रचनात्मक सक्रियता पारस्परिक संवाद के जरिए अपने कलात्मक और प्रतिरोधात्मक आयामों पर गंभीर विचार कर सके.

 

 

हिन्दी व मराठी रचनाकारों का समन्वित विमर्श

  स्थानीय संयोजक

 बसंत त्रिपाठी

 

 

संगमन-21 परिवार

   1. गिरिराज किशोर 2. अमरीक सिंह दीप 3. कमलेश भट्ट कमल4. भालचंद्र जोशी 5. राजकुमार राकेश  6. अल्पना मिश्र 7. कैलाश वानखेड़े 8. प्रियंवद 9. जीवेश प्रभाकर

 

 

कृपया ध्यान दें कि कार्ड में दिए गए नामों में सर्व श्री महेश एलकुंचवार, डा. श्रीधर पवार, जयशंकर, शशांक, आनंद हर्षुल परेश कामदार, राकेश कुमार सिंह उपस्थित नहीं हो सके थे। सर्वश्री वीरा साथीदार तथा मुकेश बिजौले उनस्थित थे। संगमन-21 कि विस्तृत रिर्पोट,
बातचीत तथा अन्य गतिविधियाँ अकार -43 मार्च 2016 के विशेषांक में प्रकाशित हो रही है। यह अंक वेबसाइट पर उपलब्ध रहेगा।