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संगमन-21 रिपोर्ट

हिंदी और मराठी के रचनाकारों-बुद्धिजीवियों द्वारा रचनात्मकता और प्रतिरोध के पारस्परिक संबंधों को तलाशने का साझा उपक्रम

सृजन किसी भी कला का केन्द्र बिन्दु होता है और प्रतिरोध उसका मूल स्वभाव. एक रचनाकार या कि कलाकार, जब भी रचाव की प्रक्रिया में डूबता है तो वह किसी न किसी स्थापित ग्रंथि अथवा सत्ता के विरुद्ध ‘ना’ कहते हुए उसका एक विकल्प प्रस्तुत कर रहा होता है. इस तरह रचना और प्रतिरोध एक दूसरे के समानार्थी और कई अर्थों में एक दूसरे के पूरक भी हैं क्योंकि दोनों ही एक दूसरे की दुनिया में निरंतर आवाजाही करते हैं. न केवल आवाजाही, बल्कि एक दूसरे को प्रभावित भी करते हैं और उससे दिशा भी पाते हैं. कह सकते हैं कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में प्रतिरोध का रचनात्मकता के साथ घनिष्ठ संबंध है. लेकिन इसका कोई अंतिम और स्थायी नियम नहीं है. यह बहुत कुछ रचनाकार के स्वभाव और उसकी प्रकृति पर निर्भर करता है.

आज वैश्विक रूप में हम जिस तरह की सभ्यता के बीच खड़े हैं उसमें एक रचनाकार का दायित्व पहले की तुलना में कहीं अधिक गंभीर और चुनौतीपूर्ण है. ऐसे में सतत संवाद ही वह आयाम है जो प्रतिरोध और रचनात्मकता के पारस्परिक रूपांतरण को नए रूप में तलाश सकता है. संवाद न केवल रचनाकार और समाज की विभिन्न संस्थाओं के बीच ज़रूरी है बल्कि विभिन्न भाषायी-समाज की सक्रियता और कलात्मक विशिष्टता के बीच भी ज़रूरी है.

ऐसे ही कुछ सवालों और उद्देश्यों को केन्द्र में रखते हुए संगमन का 21 वाँ आयोजन नागपुर (महाराष्ट्र) में दिनांक 2,3,4 अक्टूबर 2015 को संपन्न हुआ. इसका केंद्रीय विषय था – ‘रचनात्मकता और प्रतिरोध:पारस्परिक रूपांतरण के आयाम’. इसमें  हिन्दी और मराठी के शीर्षतः रचनाकर और संस्कृतिकर्मियों ने अपने निजी अनुभवों तथा सैद्धांतिक और कलात्मक बहसों द्वारा संवाद के जरिए अपने प्रतिरोधात्मक आयामों पर विस्तार से अपनी बातें रखी. संगमन-21 के स्थानीय संयोजक बसंत त्रिपाठी थे.

दिनांक 2 अक्टूबर 2015 को उद्घाटन सत्र के आरंभ में संगमन के वरिष्ठ सदस्य और रचनाकार कमलेश भट्ट कमल ने ‘संगमन’ की परिकल्पना प्रस्तुत करते हुए कहा कि संगमन देश की ऐसी संस्था है जो लेखकों और इसके सदस्यों का सहकारी साझा उपक्रम है. इसलिए इसका न तो कोई पदाधिकारी है और न ही कोई संस्थाबद्ध स्वरूप. कानपुर से शुरू होकर अपने इक्कीसवें कदम में यह आज नागपुर पहुँचा है. उस नागपुर में, जो संतरे की मिठास, किसानों की आत्महत्या की कड़ुवाहट और एक कट्टर सांप्रदायिक संस्था के मुख्यालय के रूप में देशभर में चर्चित है. संगमन की यात्रा का संक्षिप्त परिचय देते हुए उन्होंने कहा कि अब तक यह केवल हिंदी भाषा के साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों के विमर्श का मंच था. आज उसे मराठी साहित्यिक-समाज से जोड़कर हम एक नए प्रयोग की ओर बढ़ रहे हैं. अपने आयोजकीय वक्तव्य में बसंत त्रिपाठी ने प्रतिरोध की जरूरत को रेखांकित करते हुए कहा कि मराठी और हिंदी के संवेदनशील और जिम्मेदार लोग किसी एक ही मुद्दे को केंद्र में रखकर अपने विचार और अनुभव साझा करें, यही इस आयोजन का उद्देश्य है. प्रतिरोध के चूँकि कई-कई आयाम हैं इसलिए संगमन-21 में केवल साहित्यकार ही नहीं अपितु अन्यान्य क्षेत्रों में काम कर रहे जिम्मेदार एवं जागरुक चिंतक एवं कर्मी इसमें हिस्सेदारी कर रहे हैं.

आयोजन का बीज वक्तव्य हिंदी के चर्चित कवि लाल्टू ने दिया. अपने लगभग एक घंटे के लिखित वक्तव्य में उन्होंने वैश्विक साहित्य में प्रतिरोध के विविध स्वरों के विचार और उसके कलात्मक आयामों पर प्रकाश डाला.लाल्टू जी ने प्रतिरोध को मनुष्य का मूल स्वभाव मानते हुए कहा कि  सामान्य तौर पर प्रतिरोध की बातें प्रिय नहीं होती. साहित्य में प्रतिरोध का एक सौंदर्यशास्त्रीय मूल्य भी होता है, भले ही वह अराजक हो. और प्रतिरोध की अभिव्यक्ति भी सब जगह एक जैसी नहीं नहीं होती, हालांकि यह मनुष्य को कुदरती तौर पर मिला हुआ है. लाल्टू ने अपने बीज वक्तव्य में भक्तिकाल, बंगाली और हिंदी के आधुनिक साहित्य सहित अमेरिका, यूरोप, लैटिन अमेरिका के भिन्न-भिन्न साहित्य धाराओं की विस्तार से चर्चा की. 

       हिंदी के वरिष्ठ कवि और चिंतक प्रभात त्रिपाठी ने अपने गंभीर वक्तव्य में प्रतिरोध के भिन्न-भिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कई सवाल उठाए. सर्वप्रथम उन्होंने दो अक्टूबर के निमित्त गाँधी को याद किया और बहुत पहले धर्मयुग में छपी उनकी एक कविता की चंद पंक्तियों से अपनी बात शुरू की चाहे. उन्होंने कहा कि तात्विक एकता, तात्विक सार्वजनिकता की जितनी भी बातें हम कर लें, एक ‘मैं’ रहता है. यह जो ‘मैं’ या ‘सेल्फ’ की समस्या है, यही सारी दुनिया की समस्या में बदलती है. हम जाने या अनजाने इस सेल्फ के साथ ही कार्य करते हैं और कभी कभी आत्मसजगता के साथ भी. एक लेखक जब पूरी तैयारी के साथ भी लिखता है, अन्य ऐसी बातों के साथ जो निर्णीत है, तब भी दरअसल अपनी बात ही लिख रहा होता है. प्रतिरोध निरी सामाजिक चेतना नहीं है. प्रतिरोध यदि पिछले कुछ समय से बड़े पैमाने पर किया जा रहा है तो इसके लिए कुछ ऐतिहासिक परिस्थितियाँ जिम्मेदार हैं. प्रतिरोध के कई कई रूप हैं लेकिन लेखक जो प्रतिरोध करता है उसका संबंध भाषिक संवेदना और रचनात्मकता के साथ संबद्ध है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सारी दुनिया का साहित्य और हिंदी का भी, मध्यवर्ग का साहित्य है. यह मध्यवर्ग के लोगों द्वारा लिखा जा रहा है. और उसमें भी ज्यादातर पुरुष लेखकों के द्वारा लिखा जा रहा है. आज जो चित्र दिखाई पड़ रहा है उसमें मध्यवर्ग का लगभग नब्बे फीसदी हिस्सा प्रतिक्रियावादी शक्तियों के साथ है. ऐसी शक्तियों के साथ जो समाज में गैरबराबरी के विचार का समर्थन करते हैं. ऐसे में इस पर विचार होना चाहिए कि जिस भाषा में हम वंचितों के पक्ष में लिख रहे हैं कहीं वह कुशल चित्रण और चतुराई की भाषा तो नहीं है? जो पीड़ित हैं उन तक हमारा लेखन किस तरह पहुँच रहा है, इस पर बात होनी चाहिए, क्योंकि जो लेखक है वह सीधे तौर पर पीड़ित नहीं है. बल्कि वह फायदे के सिरे पर खड़ा है.

वरिष्ठ पत्रकार और दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक प्रकाश दुबे ने प्रतिरोध को सतत जारी रहने वाली प्रक्रिया कहते हुए इस पर जोर दिया कि प्रतिरोध अपने स्वरूप में तात्कालिक और दीर्घजीवी दोनों हो सकता है. लेकिन यह तब तक प्रभावी नहीं हो सकता, जब तक इसकी कीमत चुकाने की हमारी तैयारी न हो. तकनीक और नए साधनों ने अभिव्यक्ति की गंभीरता के प्रति हमें लापरवाह बना दिया है. लेकिन हमें समझना होगा और जिम्मेदारी को भी प्रतिरोध का हिस्सा बनाना होगा.

वरिष्ठ कथाकार राजकुमार राकेश ने अपने आलेख में वर्तमान माहौल और उसके बरअक्स प्रतिरोध के खतरे और उसकी जरूरत का विस्तृत खाका अपने आलेख में खींचा. विश्व हिंदी सम्मेलन के सरकारीकरण, लेखकों–चिंतकों की हत्याओं, लोकतांत्रिक एवं रचनात्मकता के प्रति समर्पित रहने वाली स्वायत्त संस्थाओं के भगवाकरण जैसे मुद्दे उठाते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान शासन व्यवस्था जानबूझकर ऐसी स्थिति बनाने की कोशिश कर रही है जिससे लोगों के भीतर भय पैदा हो और वे विद्रोह के प्रति सोच भी न पाएँ. राजकुमार राकेश जी का मानना है कि  हर किस्म की रचनात्मकता अपने काल की मौजूदा अभिजनवादी व्यवस्था का प्रतिरोध प्रस्तुत करती है. रचना का संभव होना ही इस बात का सांकेतिक निरूपण है कि रचनाकार ने अपने समाज के क्रूड यथार्थ को एक स्वप्निल यथार्थ में बदलकर मौजूदा समाज को बदल डालने और एक नए स्थानापन्न समाज के बन आने का एक खाका पेश किया है. अपने इस प्रारूप में ही वह सामाजिक और व्यवस्थागत प्रतिरोध का निरूपण है. हर रचना अपने तौर पर एक राजनैतिक मसौदा भी साथ लेकर चलती है. वही मसौदा मौजूदा व्यवस्थाओं के प्रतिरोध के तौर पर समाज के सामने उपस्थित होता है. प्रतिरोध की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में समस्त सांस्कृतिक आन्दोलन समाहित हो जाते हैं. आज तक जो भी व्यापक परिवर्तन या सुधार के आन्दोलन हुए हैं, वे सब अभिजनवादी व्यवस्था के खिलाफ लोक का विद्रोह रहा है. जब भी अभिजन की संस्कृति लोक-विरोधी हुई, तो इसी लोक ने वर्चस्ववादी अभिजनवाद के खिलाफ उठ खड़े होने का साहस किया है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज प्रतिरोध को व्यापक स्तर पर जनता के बीच ले जाने की जरूरत है.

मीडिया विश्लेषक और लेखक-चिंतक आनंद प्रधान ने अपने वक्तव्य में मीडिया और उसके उपांगों पर केन्द्रित करते हुए कहा कि आज का टेलीविजन मीडिया और अखबार मनोरंजन उद्योग का हिस्सा बन गया है. आज का कारपोरेट मीडिया शासकों के पक्ष में बुद्धि को मैनेज करने में लगा हुआ है. और ये प्रक्रिया लंबे समय से चल रही हैं सरकारें चाहे जो भी रही हों. आज का मीडिया आमजन को उपभोक्ता बनाने पर उतारू है क्योंकि बिना उपभोक्ता बनाए उसे प्रतिरोध की चेतना से दूर नहीं किया जा सकता.

उद्घाटन सत्र का समाहार करते हुए मराठी के वरिष्ठ रचनाकार और चिंतक श्रीपाद जोशी ने कहा कि आज का दौर मीडिया और विकास के आतंक का दौर है. यथास्थितिवादी शक्तियाँ इस कोशिश में लगी हैं कि आमजन को तैयार सोच और जीवन उपलब्ध कराएँ. इस व्यवस्था का प्रतिरोध राजनीतिक हस्तक्षेप के बगैर संभव नहीं है. मराठी और हिंदी की रचनाशीलता के प्रसंगों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज हमारी स्थिति किसी सांस्कृतिक कृत्य को करने की अपेक्षा प्रतिक्रिया की ही मात्र रह गई है. जब तक हम प्रतिरोध की अवधारणा को रचनात्मकता के दायरे से बाहर रखेंगे, तब तक हमारे प्रतिरोध कुचले जाते रहेंगे. पहले सत्र का संचालन बसंत त्रिपाठी ने किया.

दूसरे सत्र की शुरुआत मराठी के अत्यंत चर्चित कवि वसंत आबाजी डहाके ने की. उन्होंने मराठी की प्रबोधन परंपरा के जरिए प्रतिरोध और रचनात्मकता के पारस्परिक संवाद को समझने की कोशिश की. अत्यंत मद्धिम और शांत लहजे में अपने समय की बेचैनी और विद्रूपता को रखते हुए कहा कि 1890 के दशक में जब गोपाल गणेश आगरकर सुधारणा की परंपरा के विस्तार में लगे हुए थे, तब प्रतिक्रियावादी शक्तियों ने सुधारक की सांकेतिक शवयात्रा निकाली थी. आज हमने इतना विकास कर लिया है कि अब सुधार की परंपरा में काम करने वाले चिंतकों की सचमुच की शवयात्रा निकलती है ! अपने वक्तव्य में डहाके जी ने मराठी प्रबोधन की दो परंपराओं का जिक्र किया. पहली परंपरा बालशास्त्री जांभोकर से शुरू होती है. रानाडे, आगरकर आदि इसी में आते हैं. दूसरी परंपरा फुले से शुरू होती है. इसमें नारायण लोखंडे, विट्ठाल शिन्दे, शाहू महाराज आदि आते हैं. संत साहित्य से शुरू हुई इन दोनों ही परंपराओं ने समाज की वैज्ञानिक उन्नति, धार्मिक कर्मकांड, जाति-व्यवस्था और स्त्रियों की गैर-बराबरी को अत्यंत गंभीरता के साथ सामने लाया. प्रबोधन की परंपरा को आज की स्थितियों की विकटता से मिलान करते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी एक विचारधारा के जरिए मानव समाज के सभी सवालों के हल संभव नहीं है. मानव कल्याण के उद्देश्य से कई-कई विचारधाराएँ आती हैं. जब वे संयुक्त रूप से प्रकट होंगी तभी प्रतिरोध अपनी पूरी ताकत के साथ प्रकट होगा.

भोपाल से आए संगठनकर्मी और चिंतक ईश्वर दोस्त ने वर्तमान परिदृष्य की मुश्किलों का खाका खींचते हुए कहा कि आज बहस का महौल नहीं रह गया है क्योंकि हम बाहर के गढ़ और आंदोलन को तो देख रहे हैं लेकिन भीतरी गढ़ और आंदोलन से अनजान हो गए हैं, द्वंद्ववाद और आत्मप्राश्नेयता को भूल गए हैं. उन्होंने मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता ‘अँधेरे में’ को याद करते हुए कहा कि आज अभिव्यक्ति की खतरे उठाने और विचार और मूल्य के दायरे से चीजों को देखने से ही प्रतिरोध की प्रतिबद्धता और पक्षधरता स्पष्ट हो सकेगी.

वरिष्ठ आंदोलनकर्मी और सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर लिखनेवाली शोमा सेन ने प्रतिरोध को नारी मुक्ति आंदोलन से जोड़ते हुए कहा कि साठ और सत्तर के दशक में न्यू लेफ्ट आंदोलन से जुड़ी महिलाओं को इसका अभास हुआ कि उन्हें आंदोलन में दोयम स्थान पर रखा जाता है. इसके खिलाफ ही महिलाएँ अपनी-अपनी विचारधारा के साथ सामने आईं और इसका असर साहित्य पर भी पड़ा. जिसे हम स्त्री-विमर्श कहते हैं उसकी सबसे बड़ी देन यह है कि कि उसने साहित्यिक इतिहास में छूट गई कड़ियों की नए सिरे से तलाश की और उसे उचित सम्मान दिया. नारी कभी मौन रहकर और कभी मुखर होकर अपने उत्पीड़न का प्रतिरोध करती है. चूँकि हम पितृसत्तात्मक समाज में रहते हैं इसलिए उत्पीड़न का सहज शिकार महिलाएँ ही होती हैं. उन्होंने सामाजिक सुधार के लिए वर्ग-संघर्ष की जरूरत को महत्वपूर्ण कहा. हिंदी कहानी में अपनी अनूठी शैली के कारण चर्चा में आई युवा कथाकार उपासना ने घर-परिवार से शुरू करके लोक-गीतों और लोक-संस्कृतियों में उपस्थित प्रतिरोध की बारीक बुनावट को रेखांकित किया और बताया कि नारी कैसे अपने शोषण और उत्पीड़न के रचनात्मक तरीके से रेखांकित करती है.  

मराठी के चर्चित दलित कवि लोकनाथ यशवंत ने कविता की स्थापित धारा से अपनी आपत्ति जताते हुए कहा कि केवल दलित रचनाकार ही असल में वैश्विक महत्व का साहित्य रच रहे हैं क्योंकि उनके प्रतिरोध की भाषा में कुछ भी अवैज्ञानिक और बनावटीपन नहीं है. इसी क्रम में उन्होंने अपने कवि बनने की प्रक्रिया को अत्यंत अनूठी शैली में व्यक्त किया. शिल्पकार और चित्रकारी के क्षेत्र में अत्यंत मौलिक कार्यों के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाले संगठनकर्मी और कार्यकर्ता गोपाल नायडू ने कला के क्षेत्र में उपस्थित प्रतिरोध की अवधारण और उसके कलात्मक प्रयोगों पर विस्तार से अपनी बात रखी.

भिलाई से इस आयोजन में आए आलोचक सियाराम शर्मा ने किसानों की मौजूदा स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए प्रेमचंद की कहानी ‘पूस की रात’ से अपनी बात शुरू करते हुए कहा कि आजादी के बाद के वर्षों से लेकर आज तक भारत के किसानों की लगातार दुर्गति हुई है. हिंदी की समकालीन कविता में किसानों की पीड़ाओं को दर्ज करने वाली कुछ चुनिंदा कविताओं की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए कहा कि हमारा हिंदी साहित्य महानगरीय उच्च-मध्यवर्गीयबोध से ग्रसित हो चुका है. इस सत्र का संचालन हिंदी के चर्चित कथाकार कैलाश वानखेड़े ने किया.

पहले दिन के दूसरे सत्र में सियाराम शर्मा ने कुछ ऐसे बेचैन कर देने वाले सवालों को उठा दिया था जिसका हल कम से कम किसी रचनाकार के पास तो नहीं था. सत्र की समाप्ति के बाद चित्रकार पंकज दीक्षित के पोस्टरों को देखते हुए और आपसी बातचीत में ये सवाल घुमड़ते रहे. कमोबेश पहले दिन के दोनों सत्रों में जितने सवाल उठे थे, पंकज दीक्षित ने उन्हीं सवालों को अपने पोस्टरों के जरिए और तीखा और कर दिया था. उनकी पोस्टर प्रदर्शनी में छुपी रचनात्मक बेचैनियों से कोई भी बचा न रह सका.

अगले दिन की शुरुआत किसान आंदोलन से जुड़े प्रखर नेता और चिंतक विजय जावंधिया के वक्तव्य से हुई. पहले दिन सियाराम शर्मा ने जिन सवालों को उठाया था उसे विस्तार देते हुए विजय जावंधिया ने कहा कि यह कितनी बड़ी विडंबना है कि आज किसान, किसानी के सवाल पर नहीं आरक्षण के सवाल पर आंदोलन कर रहे हैं. महाराष्ट्र के मराठा, गुजरात के पटेल, उत्तरप्रदेश के जाट, हरियाणा के गूजर और कर्नाटक के लिंगायत किसान ही हैं. ये आज नौकरी में आरक्षण के लिए आंदोलनरत हैं क्योंकि किसानी आज फायदे की बात नहीं रह गई है. इस स्थिति के लिए उन्होंने किसानों के प्रति समाज और राजनीति के उपेक्षित रवैये को जिम्मेदार ठहराया. जावंधियाजी ने अपने वक्तव्य में कहा कि नीति निर्माता और विधाता और व्यवस्था से जुड़े हुए लोग केवल मध्यवर्ग के लोगों को ध्यान में रखकर नीतियाँ बनाते हैं, इसीलिए किसानों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. कृषि को आयविहीन बनाने का कुचक्र जारी है जिसका प्रभाव देश की कृषि उपज और अर्थव्यवस्था पर स्पष्टः देखा जा सकता है. उन्होंने रचनाकारों और बुद्धिजीवियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि वे समाज और व्यवस्था के अन्य विसंगतियों और अन्याय पर अपनी कलम के जरिए जमकर प्रहार करते हैं लेकिन देश में किसान और उनकी समस्याओं पर यथोचित एवं गंभीर लेखन नहीं करते. इसी क्रम में उन्होंने कहा कि आज के किसानों की समस्या पहले से बिल्कुल अलग है. आज उनकी जरूरत और प्राथमिकताएँ अलग हैं लेकिन हिंदी अथवा मराठी के रचनाकार इससे अनभिज्ञ हैं. किसानों की समस्याएँ राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थितियों को बदले बिना नहीं सुलझाई जा सकती और इस ओर राजनीति और समाज का ध्यान आकर्षित कराने में लेखकों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है.

कुछ इसी तरह की अपेक्षाएँ अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के हरीश देशमुख ने व्यक्त की. अंधश्रद्धा के क्षेत्र में अपनी कार्रवाईयों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि साहित्य और कला का समाज में व्यापक असर होता है. यदि इन माध्यमों द्वारा समाज का प्रबोधन किया जाए तो निर्मूलन के आंदोलन में निश्चित तौर पर तेजी आएगी. हिंदी के कवि और विगत दो दशकों से नाटक में सक्रिय हरिओम राजोरिया ने कस्बों से जुड़े अपने रंगमंचीय अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि नाटक आज भी जनता से संवाद के सशक्त माध्यम हैं. समाज में व्याप्त विसंगतियों और असमानताओं से उबरने में इसकी बड़ी भूमिका हो सकती है.

वरिष्ठ पत्रकार और समालोचक प्रकाश चंद्रायण की राय थी कि रचनात्मक और प्रतिरोध के पारस्परिक रूपांतरण के बिना साहित्य कला तो क्या किसी भी गतिविधि को अंजाम नहीं दिया जा सकता. यह भ्रम जानबूझकर फैलाया गया कि रचनात्मकता, साहित्य और कला का काम है और प्रतिरोध, राजनीति का औजार. मानवीय सरोकारों के समस्त क्रियाकलापों को गतिमान रखने में रचनात्मकता और प्रतिरोध परस्पर पूरक हैं इनका पृथक वजूद सिर्फ कल्पना में ही संभव है. एक भविष्योन्मुख प्रतिरोध में सूक्ष्म रचनात्मकता निहित रहती है और सच्ची रचानात्मकता प्रतिरोध के आवेग से ही जीवित रहती है. चर्चित युवा कथाकार राकेश मिश्र अपने वक्तव्य में कहा कि न्याय की आकांक्षा से ही रचना और प्रतिरोध दोनों का जन्म होता है. न्याय की आकांक्षा जितनी दीर्घ होगी, रचनात्मकता में प्रतिरोध और प्रतिरोध में रचनात्मकता के उतने ही प्रदीर्घ अवसर उपलब्ध होंगे. लेकिन बदलते समय में ठोस वस्तु के रूप में हमारे सामने उपस्थित हो रही हैं, जिससे शब्द और उनके अर्थ तेजी से बदल रहे हैं. ऐसे में रचना या कला के किसी एक पक्ष के प्रतिरोध का असर ज्यादा देर तक टिक नहीं पाएगा इसलिए आज इसके कारकों को समझने की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा है. कवयित्री प्रज्ञा रावत ने अपने वक्तव्य में कहा कि मार्मिकता ही रचनात्मकता को प्रतिरोध के औजार में बदल देती है. जब कोई रचनाकार या कलाकार अपनी अनुभूतियों को अपनी रचना या कला में अभिव्यक्त करता है तो वह जन-सामान्य में अपनी जगह बना लेती है और उसका मर्म जन-सामान्य के लिए प्रतिरोध के औजार में तब्दील हो जाता है.

मराठी के चर्चित कवि प्रफुल्ल शिलेदार ने बीसवीं शताब्दी में मराठी कविता में प्रतिरोध के तमाम स्वरों का जायजा लेते हुए बा.सी. मर्ढेकर से लेकर मलिका अमर शेख और ब्रजेश सोलंकी तक की कविताओं का क्रमवार जिक्र किया. उन्होंने कहा कि मराठी कविता ने आधुनिक स्वरूप ग्रहण करने के बावजूद रचनात्मकता को अक्षुण्य बनाए रखते हुए खुद को समय और जरूरत के मुताबिक प्रतिरोध की धाराओं को मुखरित किया. उन्होंने वसंत दत्तात्रय गुर्जर की कविता ‘गाँधी मला भेटला’ और उस पर चलने वाले मुकदमे के मार्फत प्रतिरोध की प्रकृति का विश्लेषण किया. इसी क्रम में उन्होंने मराठी की कुछ चुनिंदा कविताओं की पंक्तियों के उल्लेखनीय अनुवाद भी प्रस्तुत किए. उनके वक्तव्य ने मराठी कविता में प्रतिरोध के स्वर को और उसकी भिन्न-भिन्न धाराओं को समझने में मुख्य भूमिका निभाई. इस सत्र का समापन चर्चित युवा कथाकार शिवेन्द्र के वक्तव्य से हुआ. शिवेन्द्र ने पाषाण काल से लेकर समकालीन परिदृष्य में रचनात्मक पक्षों का जायजा लेते हुए इस बात की ओर इशारा किया कि हमारे लड़ने की ऐतिहासिक स्मृतियाँ अभी विस्मृत नहीं हुईं हैं. सत्र का संचालन हिंदी के यशस्वी कथाकार भालचंद्र जोशी ने किया.

दूसरे दिन के संध्या सत्र में अकीरो कुरोसावा की बहुचर्चित फिल्म ‘डोडे-सुका-डेन’ दिखाई गई. पूँजीवाद के परनाले को उघाड़ने के लिहाज से यह बेहतरीन फिल्म है. फिल्म से पूर्व चर्चित कथाकार मनोज रुपड़ा ने अपना एक लेख पढ़ा, जिसमें एशियाई और यूरोपीय सिनेमा की तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि कुरोसावा की उक्त फिल्म एक तरह की राजनीतिक टिप्पणी है. इस फिल्म के माध्यम से कुरोसावा ने साफ-साफ बता दिया कि कला उनके लिए सिर्फ एक छवि या लैण्डस्कैप या ध्वनि रिकॉर्डिंग का खेल या दार्शनिक भाव-भंगिमा का एक्सपोज़र नहीं है.

संगमन-21 के तीसरे और अंतिम दिन की शुरुआत सियाराम शर्मा के वक्तव्य से हुई. उन्होंने मौजूदा परिवेश की विडंबनाओं की वैचारिकी और राजनीतिक षड़यंत्रों पर विस्तार से अपनी बात रखते हुए कहा कि हमें आज एक बंजर समय में प्रतिरोध करना है.. युवा कथाकार मिथिलेश प्रियदर्शी ने हमारा समय ऐसा है जिसमें एक तरफ तो निहायत शातिराना तरीके से अपराधियों को रिहा किया जा रहा है और समाज के प्रति संवेदना रखते हुए लड़ने वालों को जान बूझकर जेलों में ठूँस दिया जा रहा है और दूसरी तरफ ऐसी स्थियों से लड़ने वाले नायक भी उभरकर सामने आ रहे हैं. लेखकों को यह तय करना है कि वह किसे अपने लेखन में बतौर विषय चुने. हिंदी के कवि नासिर अहमद सिकंदर ने हिंदी और उर्दू की कविता में प्रतिरोध के स्वरों का जायजा लेते हुए कहा आज आज अल्पसंख्यकों की संवेदनाओं पर लिखना भी प्रतिपक्ष की भूमिका निभाएगा. अपने वक्तव्य में उन्होंने खास तौर पर इसका जिक्र किया कि प्रतिपक्ष की कविता का स्वरूप न स्थानीयता और लोक की रागात्मक छवियों से बनेगा, न अत्यधिक जटिल बिम्बों या उकसावे के उद्बोधनों से, बल्कि इसका स्वरूप उस पक्ष के दुष्प्रचारित तर्कों और  निर्णयों के बरअक्स कलात्मक और संवेदनात्मक संबोधनों से भी बनेगा. प्रतिपक्ष की कविता अपने स्वरूप में जनपक्ष की कविता है और जनपक्षीय चेतना विचारधारा से युक्त होकर ही सम्पूर्ण होगी. कथाकार कैलाश वनवासी ने लेखक के जागरुक होने की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि जब तक वह खुद जागरुक न हो समाज को जगरुक नहीं कर सकता. प्रतिबद्धता के संदर्भ में उन्होंने कहा कि यह कोई फैशन कि वस्तु नहीं है. यह साहित्य और संस्कृति को बचाए रखने के साथ उसे आगे बढ़ाने का काम भी करता है.

अपनी कहानियों में शोषितों और वंचितों की आवाज को प्रमुखता से रखने वाले कथाकार कैलाश वानखेड़े ने कहा कि समाज में ऊपरी तौर पर छुआछूत और भेदभाव खत्म होता हुआ दिखाई देता है लेकिन आचरण और मानसिकता में यह जस का तस विद्यमान है. अब इसे पोषित करने के लिए कई तरह की भ्रामक बातें भी फैलाई जा रही है. असल बात यह है कि आज भी समाज के भीतर लोकतंत्र नहीं आया है. चित्रकार पंकज दीक्षित ने अपने वक्तव्य में भाऊ समर्थ को शिद्दत से याद किया. उल्लेखनीय है कि उनकी पोस्टर प्रदर्शनी के साथ भाऊ समर्थ के कई रेखाचित्र भी प्रदर्शित किए गए थे, जिसे लोगों ने बहुत सराहा.

युवा कथाकार मनोज पांडेय ने फासीवादी शक्तियों की कार्य-प्रणाली पर बात करते हुए कहा कि ऐसी शक्तियां बीस-पचीस साल आगे के समय को ध्यान में रखते हुए अपनी रणनीति बनाती है. इसी का परिणाम होता है कि वह जनसंहार के आरोपी व्यक्ति को बहुमत से जितवाकर सत्ता के शीर्ष पर बैठा देती है. उन्होंने सवाल उठाया कि प्रतिरोध करने वाली शक्तियों के पास लंबे वक्त की सक्रियता और सपने क्यों नहीं है? खुले सत्र में ऑस्कर के लिए नमांकित मराठी फिल्म ‘कोर्ट’ के मुख्य अभिनेता विरा साथीदार ने आज के समय में प्रतिरोध की जरूरत को रेखांकित करते हुए मुक्तिबोध सहित मराठी सिनेमा को याद किया. खुले सत्र में अनिरुद्ध नीरव, तुषार कांति ने भी अपनी बात रखी. इस सत्र का समापन आनंद प्रधान के वक्तव्य से हुआ. सत्र का संचालन प्रफुल्ल शिलेदार ने किया.

संगमन-21 का समाहार वरिष्ठ कथाकार गिरिराज किशोर के अत्यंत सारगर्भित उद्बोधन से हुआ. उन्होंने कहा कि गौतम बुद्ध के बाद प्रतिरोध करने वाले दो व्यक्ति सार्वाधिक महत्वपूर्ण हैं – गाँधी और अंबेडकर. इन दोनों ने समाज के भीतर प्रतिरोध की जो आवाज पैदा की है, उसकी अनुगूँज लंबे समय तक सुनाई देगी. डॉ. अंबेडकर ने हजारों सालों की प्रताड़ना पर सवाल उठाए थे. इतने लंबे दर्द और तकलीफ के बावजूद उन्होंने हिंसा का रास्ता नहीं चुना. यह इस देश की शांति और उसकी आत्मा को बचाए रखने में उनका बहुत बड़ा योगदान है. सरकार की नीतियों पर प्रहार करते हुए कहा कि वह डॉ. अंबेडकर इंग्लैंड वाला घर तो खरीद रही है लेकिन देश में उनके घर की सुध नहीं ले रही. दरअसल यह स्मृतियों को नष्ट करने का सुनियोजित प्रयास है. इसी क्रम में उन्होंने भारतीय समाज में गाँधी की भूमिका और जरूरत को याद किया.

अपने उद्बोधन में किसानों की समस्या का उल्लेख करते हुए गिरिराज जी ने कहा कि आज की हमारी सबसे मुख्य चिंता यह होनी चाहिए कि किसानों को कैसे बचाया जाए? सरकार तो यह कोशिश कर रही है कि किसानों के पास जमीन ही न रहे. जब जमीन ही नहीं रहेगी तो किसान कैसे बचेगा? यही हाल मजदूरों का भी है. हमारे प्रधानमंत्री विदेश में जाकर ‘मेक इन इंडिया’ का नारा दे रहे हैं. क्या किसान मेक इन इंडिया नहीं कर रहे? क्या वे विदेशों में जाकर फसल उगा रहे हैं? जनशक्ति की महत्ता को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि प्रतिरोध जब जनशक्ति का रूप लेता है तब उसे संभालने का काम साहित्य को करना पड़ता है. जिस तरह आँधी से दीए को बुझने से बचाया जाता है उसी तरह साहित्यकारों, रचनाकारों और बुद्धिजीवियों को जनशक्ति की लौ को बुझने और उदासीन होने से बचाना है. भाषा के संदर्भ में भी उन्होंने अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदी तभी बचेगी जब दूसरी भाषाएँ भी बचेंगी. इसलिए इसे दूसरी भाषाओं के साथ जोड़ना जरूरी है.

इस तरह गिरिराज जी ने संगमन के इस इक्कीसवें आयोजन में उठे तमाम सवालों और सहित्यकारों-संस्कृतिकर्मियों की जागरुकता के विभिन्न पहलुओं पर बड़ी बेबाकी से अपनी राय रखी. उन्होंने आयोजन को वैचारिक और दायित्वपूर्ण ऊँचाइयों तक पहुँचाते हुए भिन्न-भिन्न भाषाओं के बीच संवादों की प्रक्रिया को आज की जरूरत बताया. अंत में स्थानीय आयोजक बसंत त्रिपाठी ने समस्त नागपुरवासियों और संगमन परिवार के सदस्यों के प्रति इस सक्रियता के लिए आभार प्रकट किया.

पूरे आयोजन के दौरान शहर के लगभग सौ से अधिक लोगों ने अत्यंत गंभीरता के साथ लोगों की राय को सुना और अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज की. मुख्य बात यह रही कि मराठी, हिंदी और अंग्रेजी के अखबारों ने इस आयोजन के तीनों दिन की खबरों को विस्तार से जगह दी. पुष्पेन्द्र फाल्गुन ने मीडिया और आयोजन के बीच का रचनात्मक पुल बनने में मुख्य भूमिका निभाई.  

संगमन के इस आयोजन के शिल्पकार प्रियंवद जी की भाव-भंगिमा से साफ जाहिर था कि जिस रूप में इसकी उन्होंने कल्पना की थी, वह अपने मुकाम तक पहुँचा था. रचनात्मकता और प्रतिरोध के पारस्परिक रूपांतरणों की तलाश पर बातचीत के लिए उन्होंने बतौर संयोजक जो रूपरेखा बनाई थी वह बेहद सफल रहा. इस पर आगे भी कई दिनों तक बात हुई, जो किसी न किसी रूप में अब भी जारी है. बिना किसी आयोजकीय औपचारिकता के सीधे मंच पर आकर अपनी बात कहना संगमन की विशिष्ट संकल्पना है और इसे भी लोगों ने बहुत पसंद भी किया. स्थानीय संयोजक के साथ नागपुर के रचनाकार और संस्कृतिकर्मी - अनूप कुमार, प्रकाश चंद्रायन, मनोज रूपड़ा, विनोद व्यास, गोपाल नायडू, ज्ञानेश्वर शंभरकर, राकेश विश्वकर्मा, कमलेश यादव की सोच और सक्रियता ने इसको सफल बनाने में मुख्य भूमिका निभाई.