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अकार - ४७ में दलित नेता जिग्नेश मेवानी से इलानगोवन राजासेकरन की बातचीत – अनुवाद अभिषेक सक्सेना

'आप खाली पेटों को आत्मसम्मान का पाठ नहीं पढ़ा सकते'

अनुवाद - अभिषेक सक्सेना

        (दलित नेता जिग्नेश मेवानी से इलानगोवन राजासेकरन की बातचीत)

        (यह इंटरव्यू फ्रंटलाइन पत्रिका में 20 मई 2017 के अंक में छपा है। परिचयात्मक  टिप्पणी भी फ्रंटलाइन में प्रकाशित हुयी है । इस इंटरयूव्य के लिये हम फ्रंटलाइन पत्रिका व साक्षात्कारकर्ताओं के आभारी हैं ।)

       

        मध्य जुलाई, 2016 में एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें गुजरात के ऊना में कुछ दलित युवाओं को मरी हुई गाय की खाल निकालने के कारण भीड़ द्वारा पीटा जा रहा था और परेड कराई जा रही थी। इसने दलित अधिकार हेतु एक ऐसे जन आंदोलन को जन्म दिया जिसका आधुनिक भारत के इतिहास में शायद ही कोई समांतर हो।

        संघ परिवार की धमकियों एवं संत्रास का सामना करते हुए, आत्मसम्मान एवं गरिमा हेतु यह संग्राम तीन लाख से अधिक दलितों द्वारा अहमदाबाद से ऊना की लगभग 400 किमी की यात्रा से प्रारम्भ हुआ जिसमें  'गाय की पूँछ आप रख लो, हमें हमारी ज़मीनें दो' जैसे साहसी नारे लगाए गए।

        इस आंदोलन के शिल्पकारों में से एक हैं - जिग्नेश मेवानी, 36 वर्षीय वकील-कार्यकर्ता जो एक लंबे समय से गुजरात में दलित भूमि-अधिकार से जुड़े मामलों पर काम कर रहे हैं। ऊना दलित अत्याचार लादात समिति के समन्वयक के तौर पर इन्होंने दलितों को यह प्रतिज्ञा दिलाई कि वे विशेष समुदाय में जन्म लेने के कारण, जन्मजात रूप से जुड़े मृत पशुओं की खाल उतारने जैसे काम नहीं करेंगे।

        साम्प्रदायिक ताकतों के बढ़ते खतरे के खिलाफ, धर्मनिरपेक्षता को बचाने और जाति विहीन समाज की स्थापना के लिए काम करने के उद्देश्य से, एक अखिल भारतीय आंदोलन प्रारम्भ करने के लिए मेवानी दलितों और वाम सहित सभी प्रगतिशील ताकतों को एक मंच पर संगठित करने के अपने महत्वाकांक्षी मिशन पर आगे बढ़ रहे हैं। इस दृष्टिकोण को लेकर दलित समुदाय के भीतर ही कई संशयवादी हैं।

        वे कहते हैं कि संघ परिवार को उसके ही गढ़ में चुनौती देना आसान नहीं है। उन्होंने अनुभव किया है कि दलितों को उनके गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार के प्रति जागरूक करना बहुत बड़ा काम है और उनका तात्कालिक लक्ष्य जाति-केन्द्रित राष्ट्रवादी हिन्दुत्व गुट को पराजित करना है। वे कहते हैं - ''यदि उन्हें हरा दिया तो समाज की टूटन को हटाया जा सकता है। परन्तु यह तब तक संभव नहीं है जब तक कि दलित अपने आपसी मनमुटावों को दफना कर प्रगतिशील ताकतों का हाथ नहीं थाम लेते।''

        मेवानी अभी हाल ही में जाति उन्मूलन मोर्चा (जथी ओझिप्पू मुन्नानि) के आमंत्रण एवं अन्य कार्यक्रमों में शिरकत करने के सिलसिले में चैन्नई में थे। उन्होंने फ्रंटलाइन से गुजरात के विकास मॉडल और उसकी विफलता, दक्षिणपंथी अतिवादियों के रूप में जन्म ले रही मुसीबत और दलित समुदाय के भीतर मतभेदों पर अपनी बात रखी।

 

प्रस्तुत हैं उनसे हुई बातचीत के अंश :

 

        2001 से 2014 तक राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रस्तुत गुजरात विकास मॉडल को आज राष्ट्रीय स्तर पर दोहराये जाने की मांग की जा रही है, परन्तु आप इसे असफल मानते हुए इसकी आलोचना करते हैं। क्यों?

        गुजरात मॉडल नव-उदारवाद एवं सांप्रदायिकता का घातक संयोजन है जो पूरी तरह से मोदी के विकास की 'गोयबेल्सीयन बयानबाजी' से मेल खाता है।

        उत्तर-उदारवादी युग में अमीर और गरीब के बीच बढ़ती दूरी का लाभ उठाकर, उद्योग जगत के दिग्गज एवं राजनैतिक व्यवस्था मिलकर जनता का ध्यान अपनी आर्थिक दुर्दशा एवं नाकामी से भटकाने का प्रयास कर रहे हैं। साम्प्रदायिक फासीवाद एवं वैश्वीकरण एक दूजे के लिए ही बने हैं। यह महज एक संयोग नहीं है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस देश में नव-उदारवाद का एजेंडा लागू करने के तुरंत बाद हुआ।

        कृपया सिध्द करें ।

        ठीक है, आज गुजरात मॉडल ने किसी समय के 'वाइब्रेंट गुजरात' के चिथड़े-चिथड़े  कर दिए हैं। 2001 तक राज्य की आर्थिक स्थिति ठीक थी पर आज गंभीर वित्तीय घाटे की स्थिति है। रिपोर्ट के मुताबिक तब गुजरात का सार्वजनिक कर्ज़ तिरपन हजार करोड़ था जो आज एक लाख पैंसठ हजार करोड़ तक पहँच चुका है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि केवल और केवल उद्योगपतियों को फायदा पहुँचाने वाली अव्यावहारिक एवं जनविरोधी परियोजनाओं के कारण आज गुजरात आर्थिक दिवालियेपन का सामना कर रहा है।

        जनता के स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार एवं अधोसंरचना (इन्फ्रास्ट्रक्चर) पर सामाजिक व्यय काफी कम हुआ है। मोदी का विकास मॉडल गरीब को लूटकर अमीर को देने का मॉडल है। उन्होंने उपजाऊ जमीन और गौचार (चरागाह) तक कौड़ियों के मोल उद्योगपतियों को दे दी। नतीजन राज्य की अर्थव्यवस्था एवं पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) चिंताजनक स्थिति में पहुँच गई जिससे गंभीर कृषि संकट उत्पन्न हुआ और एक दशक में राज्य के लगभग 1000 किसान आत्महत्या करने को मजबूर हुए। यहाँ तक कि किसानों के पानी को भी बड़े उद्योगों को दे दिया गया। क्या यह विकास मॉडल है?

        क्या आपका मतलब यह है कि मोदी का विकास मॉडल, जिसने उन्हें लगातार चुनावी विजय दिलायी है, देश के लिए प्रलयंकारी सिध्द होगा?

        बिलकुल। उनका नौकरियाँ पैदा करने और सतत् उन्नति सुनिश्चित करने में असफल होना ही तो आरक्षण के लिए इतने बड़े पैमाने पर पटेल आंदोलन होने का मुख्य कारण है। हार्दिक पटेल के नेतृत्व में पाटीदार अनामत आंदोलन समिति अन्य पिछड़ा वर्ग कोटे के अंतर्गत आरक्षण के लिए आंदोलन कर रहे हैं। यदि मोदी सतत् विकास(मॉडल) हेतु वचनबध्द होते, तो पटेल जैसे समृध्द सामाजिक वर्ग के लोग दलितों की तरह शिक्षा एवं रोजगार में आरक्षण के लिए सड़कों पर ना उतरे होते। यही तो उनकी सबसे बड़ी असफलता है जिसने एक शांत राज्य में अलग-अलग जनसमूहों के बीच असामंजस्य की स्थिति पैदा कर दी है। दरअसल उनका यह मॉडल छीन लेने वाला, नष्ट कर देने वाला मॉडल है, जिसे वे पूरे देश में लागू करने का प्रयास कर रहे हैं। आप कल्पना कीजिए यदि उन्हें गुजरात मॉडल के आधार पर अपने मिशन को लागू करने का अवसर दिया गया तो क्या हालात होंगे।

        यह कह देने में कि उनका मॉडल असफल है आप बहुत जल्दबाजी तो नहीं कर रहे हैं?

        उनके मॉडल का असफल होना तय है। विख्यात विद्वानों एवं अर्थशास्त्रियों ने ऐसा कहा है। गुजरात तो सूक्ष्म स्तर पर हिन्दुत्व एजेंडे का परीक्षण करने की प्रयोगशाला रहा है। अब इन दक्षिण चरमपंथियों ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करना प्रारम्भ कर दिया है। मोदी उनका चेहरा हैं। देश का विकास उनका एजेंडा नहीं है। इसका अर्थशास्त्र और विकास से भी कोई लेना-देना नहीं है। यह तो उनका अनर्थकारी बहुसंख्यक एजेंडा है जो एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र को साम्प्रदायिक राष्ट्र बनाने का प्रयास करता है। युवाओें एवं किसानों को अभूतपूर्व धोखा दिया गया है। क्या मोदी ने अत्महत्या करने वाले किसान के घर का दौरा किया? वे भविष्य में भी ऐसा नहीं करेंगे। उनके लिए साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि बड़े औद्योगिक घराने महत्तवपूर्ण हैं। मोदी तो महज मरू-मारिचिका हैं, उनका असफल होना सुनिश्चित है।

        कई लोग तो यह दावा एवं विश्वास करते हैं कि मोदी ने गुजरात को आगे बढ़ाया है। उनकी इसी छवि का सफल प्रदर्शन तो आज केन्द्र एवं कई राज्यों में भाजपा को सत्ता में लाया है। आप इससे इन्कार नहीं कर सकते।

        यह महज परीलोक की कल्पना है। उनकी 'विकास पुरुष' की छवि कॉरपोरेट द्वारा गढ़ी गई है। गुजरात में उनकी कृषि नीति बेकार थी। करदाताओं के पैसे को भारी मात्रा में व्यय करके लाए गए विशाल नर्मदा प्रोजेक्ट ने आज आधे गुजरातियों को पानी से वंचित कर दिया है। वाल्मीकि समुदाय के एक लाख से अधिक हाथ से मैला ढोने वाले सफाई कर्मचारी बेसिक न्यूनतम मजदूरी हेतु संघर्ष कर रहे हैं। उन्हें इस छोटे स्तर के काम से बचाने एवं पुनर्वासित करने हेतु कोई प्रयास दिखाई नहीं देते।

        यह सुनियोजित तरीके से बनाई हुई छवि है कि गुजरात चमक रहा है। क्या आप जानते हैं कि यह 10 विकसित राज्यों में भी नहीं है जबकि मोदी 2001 से चार कार्यकाल सत्ता में रहे हैं। गुजरात में देश में सर्वाधिक कुपोषित लोग हैं और आज यह सर्वाधिक भ्रष्ट राज्य है।

        मोदी ने गरीबों के लिए राज्य में पचास लाख घर बनाने का वादा किया था लेकिन आज तक इसका एक प्रतिशत कार्य भी पूरा नहीं हो सका है। मुख्यतया इंदिरा आवास योजना के तहत बनाए जाने वाले ये आवास अधिकतम दो वर्ष के भीतर बनकर तैयार होने थे परन्तु उनमें से अधिकांशत: अभी तक अधूरे हैं, जबकि सरकार का दावा है कि लक्ष्य प्राप्त कर लिया गया है। अधूरे घरों को भी पूरा दिखा दिया गया है। अन्य कल्याणकारी योजनाओं का भी यही हाल है। ये फर्जी आंकड़े गुजरात मॉडल के खोखलेपन को जाहिर करते हैं जिसमें दलितों एवं वंचितों के लिए कुछ नहीं है।  

        परन्तु मोदी तो ये दावा करते हैं कि उनका विकास मॉडल समावेशी है जिसमें दलितों एवं वंचितों को भी लाभ पहुँचाया है।

        यह झूठ है। आज गुजरात में दलित महिलाओं के प्रति हिंसा में 300 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई सूचना के उत्तर में उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार राज्य में जनवरी 2001 से दिसम्बर 2014 के बीच कुल 501 बलात्कार के मामले दर्ज हुए हैं। 104 गाँवों के दलित लंबे समय से मृत्यु के भय में जी रहे हैं क्योंकि उन्हें आशंका है कि उन्हें जातीय ताकतों से सुरक्षा देने वाली पुलिस को कभी भी हटाया जा सकता है और उन्हें खतरे में डाला जा सकता है। (सरकार ने मेहसाना, अहमदाबाद (ग्रामीण), अमरेली, राजकोट एवं सुरेन्द्रनगर जैसे 11 जिलों को 'अत्याचार संभावित' जिलों के रूप में चिन्हित किया है।) दुनिया जानती है कि मोदी के गुजरात में कैसे मुस्लिमों को निशाना बनाया गया। क्या यह समावेशी मॉडल है?

        ऐसे समय में जब दलित सामाजिक बहिष्कार जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं जिनका तत्काल विरोध एवं समाधान आवश्यक है, आप दलितों के बीच जमीन के वितरण पर जोर क्यों देते हैं?

        जाति के आधार पर भेदभाव की यह समस्या केवल गुजरात तक ही सीमित नहीं है। इस उत्तर-वैश्वीकरण के समय में दलित, जाति एवं वर्ग दोनों के आधार पर भेदभाव के 'दोहरे शिकार' हो रहे हैं। उत्तर-ऊना समय में दलित, जाति के आधार पर भेदभाव की पोषक हिन्दुत्ववादी ताकतों की बुराई और भूमि के मालिक होने के महत्तव को समझते हैं। आर्थिक सशक्तीकरण उन्हें सामाजिक और आर्थिक स्तर पर गरिमा प्रदान करेगा।

        भारत में भूमि ही जाति प्रणाली का निर्धारण करती है। हिन्दू जाति के सामंत भूस्वामियों के कब्जे की बेशी भूमि को दलितों के बीच बाँट देना उनके उत्थान के लिए आवश्यक है। मैंने मांग की है कि अधिकतम भूमि अधिनियम एवं अधिकतम कृषि भूमि अधिनियम के प्रावधानों के तहत गुजरात के प्रत्येक भूमिहीन दलित को पाँच एकड़(02 हेक्टेयर) भूमि बाँटी जानी चाहिए। भूमिहीन दलितों को आवंटित भूमि पट्टे कागजों पर ही रह गए हैं।

        ऐसे समय में जब मनुवादियों के प्रवचन अप्रिय होते जा रहे हैं, कोई भी यह अनुभव करेगा कि अब जाति और वर्ग दोनों को साथ-साथ हो जाना चाहिए। कोई भी भूखों को आत्मसम्मान का पाठ नहीं पढ़ा सकता। भूमि मुद्दा इस आंदोलन का महत्तवपूर्ण अंश है जिसका लक्ष्य एक सर्वसमावेशी मॉडल की ओर बढ़ना है। यदि कोई अत्याचारों के संदर्भ में अंबेडकर और मार्क्स का अध्ययन करे, तो पायेगा कि वे इस बात का समर्थन करते हैं कि सशक्तीकरण के लिए भूमि सुधार मुख्य साधन है।

        दलित मुक्ति के संदर्भ में वाम एवं अन्य प्रगतिशील ताकतों से समन्वय के संबध में आपके विचारों की आलोचना हिन्दुत्ववादी तत्वों ने नहीं बल्कि सबआल्टर्न विचारधारा के ही कुछ बुध्दिजीवियों एवं कार्यकर्ताओं ने की है।

        हाँ, मुझे इसकी जानकारी है। जहाँ तक मैं जानता हूँ, इस प्रकार का नकारात्मक एवं विभाजनकारी दृष्टिकोण अम्बेडकरवाद की आत्मा के खिलाफ है। अम्बेडकरवादी बाबासाहेब की विवेचना अपने ढंग से करते हैं जो दलितों एवं वचितों के उद्धार एवं सशक्तीकरण की राह में रोड़े अटकाते हैं। सबको पता है कि अम्बेडकर मार्क्सवादी नहीं थे, फिर भी कोई इस तथ्य को नकार नहीं सकता कि उनमें वर्ग दृष्टिकोण था। मेरा उद्देश्य तो अंबेडकर को लोगों के समक्ष उनके मूल अर्थों तथा उनके आलोचनात्मक अभिमूल्यन सहित समग्रता के साथ प्रस्तुत करना है। इससे हम उनके एवं साथ ही साथ वामपंथ के करीब भी पहुँच सकेंगे। हालांकि, जहाँ तक वर्ग का प्रश्न है यह लाज् ामी है कि हम वामपंथ के साथ लगातार उनके कथित कट्टरपंथी सिद्धान्तों के विरुद्ध चर्चा करते रहें।

        यदि खुले दिमाग एवं बुध्दिमत्ता से अम्बेडकर को समझने का प्रयत्न किया जाए तो जातिवादी एवं सम्प्रदायवादी तत्वों की खिलाफत करने वाली ताकतों के मध्य सूक्ष्म स्तर पर भी समानता देखी जा सकती है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि उत्तर-अम्बेडकर दलित आंदोलन ने हमें निराश किया है। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं जिसे अम्बेडकरवादी कहा जा सके। इसकी छोड़िए, मुख्यधारा के दलित राजनैतिक दलों का चरित्र तो और भी चौंकाने वाला है। दलित राजनैतिक दल अपनी राजनैतिक पहचान बचाए रखने में ही लगे हैं। इनके नेता अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति एवं सत्ता प्राप्ति के लिए मनमाने तरीके अपना रहे हैं।

        अम्बेडकरवादी साधिकार मुझसे असहमत हो सकते हैं। लेकिन क्या दलित-वंचित समाज की छोटी आजीविका को हड़पने की प्रतीक्षा कर रहे हिन्दुत्व-पूंजीवाद रूपी राक्षस के सर्वनाश के लिए समान एजेंडा पर काम कर रही विभिन्न ताकतों को एकजुट होने की आवश्यकता नहीं है?

अलग होकर क्या हम हार जायेगें?

        जी। हमें यह समझना होगा कि विषाक्त दुश्मन- हिंदुत्व एवं इसकी वर्णाश्रम पर आधारित जाति संरचना के विरुध्द हम सब एक ही नाव पर सवार हैं। 1944 में अंबेडकर ने कहा ''छुआछूत की जड़ जाति व्यवस्था है; जाति व्यवस्था की जड़ वर्ण और आश्रम से जुड़ा धर्म है; वर्णाश्रम की जड़ ब्राह्मणवादी धर्म है तथा ब्राह्मणवादी धर्म की जड़ अधिनायकवाद एवं राजनैतिक ताकत है।''

        दक्षिणपंथी एकल-संस्कृति एवं पहचान बनाने के लिए ये ताकतें गुजरात में बाकायदा दलितों एवं मुस्लिमों को निशाना बना रही हैं। हमें यह बात दिमाग में उतार लेने की आवश्यकता है कि आज इन्होंने केन्द्र में भी सत्ता हथिया ली है। गुजरात में हमारे नारे 'गाय की पूँछ आप रख लो हमें हमारी जमीनें दो' ने नि:संदेह दक्षिणपंथी सम्प्रदायवादियों को भौचक्का कर दिया है। इसे वाम द्वारा प्रचारित दृष्टिकोण के साथ समीकृत (इक्वेटेड) किया जा सकता है। सामाजिक एवं आर्थिक न्याय कायम करने हेतु अपने समान शत्रु को पराजित करने में हम दलितों एवं वामपंथियों को मिलकर काम करना पड़े तो इसमें कोई बुराई नहीं है। मैं तो कहना चाहूँगा कि सौभाग्य से तमिलनाडु हिंदुत्व साजिशों से अछूता है और इसके लिए द्रविड़ आंदोलन की विरासत एवं उसके नेता (ई.वी. रामासामी) पेरियार धन्यवाद के पात्र हैं।

        तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन तथा दलितों एवं दलित राजनीति की आज की स्थिति पर आपके क्या विचार हैं?

        जैसा कि मैंने पहले ही कहा, देश भर में दलित राजनीति पहचान की राजनीति मात्र बनकर रह गई है। लेकिन तमिलनाडु में द्रविड़ विचारधारा ने कमोबेश राज्य की सर्वसमावेशी सामाजिक चेतना को एक स्वरूप दिया है और कट्टरपंथी तत्वों को बाहर रखा है। हालांकि यह भय है कि द्रविड़ आंदोलन के फीके पड़ने और द्रविड़ राजनैतिक दलों के कमजोर होने से दक्षिणपंथी ताकतों को प्रवेश के लिए अनुकूल अवसर मिलेगा।

        जहाँ तक मैं समझता हूँ, तमिलनाडु में अंबेडकरवादियों को यह लगता है कि दलित दलों ने वे मुद्दे नहीं उठाए जो उनसे उम्मीद की जा रही थी। उन्हें यह भी संदेह है कि वर्तमान द्रविड़ राजनैतिक दल अन्य पिछड़ा वर्ग केन्द्रित हैं अर्थात दलित विरोधी हैं जिनकी संख्या कुल आबादी का लगभग 20 प्रतिशत है। वामपंथ के वर्ग सिध्दान्त के अतिरिक्त द्रविड़ आंदोलन के प्रति उपजा यह अविश्वास एवं संदेह खारिज नहीं किया जा सकता।

        परन्तु हमें एक बात ध्यान रखनी चाहिए कि आप प्रगतिशील ताकतों को सिरे से खारिज नहीं कर सकते। हम उनके त्रुटिपूर्ण सिद्धान्तों की आलोचना कर सकते हैं। परन्तु क्या यह साम्प्रदायिक फासीवाद के विनाश के लिए कंधा से कंधा मिलाकर काम करने में रुकावट बन सकता है? क्या हम अखंड इकाई के रूप में विकसित हो रहे विकट शत्रु के विरुध्द लड़ाई अकेले-अकेले लड़ सकते हैं? तब यह कभी भी बराबर की लड़ाई हो ही नहीं सकती।

        ऐसे में जबकि सारे देश में हिंदुत्व ताकतें संगठित हो रही हैं, आप या अन्य दलित राजनैतिक दलों के नेता राष्ट्रीय स्तर पर एक साझा मंच तैयार का प्रयास क्यों नहीं करते जिसमें अंबेडकरवादी, मार्क्सवादी, धर्मनिरपेक्ष, द्रविड़ एवं अन्य शामिल हों?

        जी, निश्चित रूप से। हमारी सर्वप्रथम आवश्यकता अपने में अंतर्निहित ''आंतरिक जातिवाद'' को समाप्त कर दलित एकता कायम करना है। हम जातिविरोधी राजनीति को मूर्तरूप देने के लिए कार्यक्रमों का आयोजन करेंगे। भारत में वामपंथियों ने कुछ गलतियाँ की हैं। हम इस बात को भी नजरंदाज नहीं कर सकते कि अंबेडकरवादी राजनीति के साथ भी कुछ ऐसी ही समस्या है। हम अपने उध्दार एवं सशक्तीकरण के लिए जारी संघर्ष में हमारे साथ आने की इछा रखने वालों का स्वागत करते हैं।

        सीधी-सी बात है कि आज जो कुछ हो रहा है उसे देखकर भी यदि वामपंथी, अंबेडकरवादी एवं आत्म-सम्मान आंदोलन के कार्यकर्ता साथ नहीं आते हैं तो यह ना केवल देश बल्कि तमिलनाडु के लिए भी विनाशकारी सिध्द होगा। जिस तरह की विरासत यहाँ पेरियार के आंदोलन की है, उसके हिसाब से तो हम संघ परिवार एवं भाजपा सरीखी दुष्ट और खतरनाक मध्ययुगीन ताकतों को निश्चित रूप से पराजित कर सकते हैं। यदि ऐसी दुष्ट ताकतों के प्रवेश को रोकने हेतु हम एक साथ नहीं आए तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा।

        दलित कार्यकताओं को लगता है कि अन्य पिछडे वर्ग द्वारा जाति उत्पीड़न के विरुध्द लड़ाई को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उनकी बात ठीक भी है। जब तक आप जाति एवं उससे जुड़े भेदभाव को निचले स्तर से समाप्त नहीं कर देते तब तक आप किसी सामाजिक समूह को समग्रता प्राप्त करने के उद्देश्य से मुख्यधारा में कैसे ला सकते हैं?

        सहमत हूँ। किसी भी दलित दल या किसी दलित अधिकार समूह का अन्तिम लक्ष्य जाति उन्मूलन ही होना चाहिए फिर चाहे वह छोटे स्तर पर हो या बड़े स्तर पर। देशभर में लगभग हर जगह दलितों का उत्पीड़न 'ब्राह्मणीकृत' हो चुके अन्य पिछड़े वर्गों ने ही किया है। साथ ही भारतीय राज्यों ने भूमि सुधारों को जिस तरह से लागू किया है उससे दलितों के प्रति शूद्र और भी दमनकारी हो गए हैैं। परन्तु दलितों का सहयोग लिए बिना लोकतांत्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष ताकतों के उद्देश्य पूरे नहीं हो सकते।

        ऐसे बहुत से मुद्दों पर दलित दोषदर्शी हो गए हैं। दलित समुदाय के भीतर कुछ लोगों को लगता है कि हर चीज में ब्राह्मणों का कोई षड़यंत्र है। उन्हें लगता है कि इस धरा पर जितने भी ब्राह्मण हैं वे केवल दलितों का जीवन नष्ट करने के लिए ही हैं। उन्हें इस बात का अंदाजा ही नहीं है कि हमारी समस्या ब्राह्मणवाद से है ब्राह्मणों से नहीं। इसीलिए हाँ, मैं मानता हूँ कि हमें प्रगतिवादियों को अपने साथ लाना चाहिए बशर्ते जातियों के उन्मूलन में वे हमारे साथ जुड़ने को तैयार हों।

जातियों के उन्मूलन के विषय में आपके क्या सुझाव हैं?

        मेरा सुझाव है कि भूमि सुधार ही एक ऐसा महत्वपूर्ण साधन है जो समाज में संरचनात्मक परिवर्तन ला सकता है और दलितों-वंचितों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण में भी महती भूमिका अदा कर सकता है। जाति महज एक सामाजिक-सांस्कृतिक घटना ही नहीं है बल्कि इसका भौतिक आधार भी है।

        इसलिए मैं तमिलनाडु और दक्षिणी राज्यों में आता रहूँगा और भूमि सुधार हेतु संघर्ष प्रारंभ करने का प्रयास करता रहूँगा क्योंकि मेरा ऐसा मानना है कि भूमि सुधार (विशेषत:

हमारी पंचमी भूमि के संदर्भ में) ही जाति असमानताओं को मिटा सकता है। इसीलिए मैं ना केवल दलितों बल्कि सभी अति-गरीबों एवं जाति विरोधी ताकतों से अपील करता हूँ कि वे साथ आएँ और अंग्रेजों द्वारा दलितों को आवंटित अपनी पंचमी भूमि को पुन: प्राप्त करने के लिए साझा संघर्ष प्रारम्भ करें। हालांकि मैं जानता हूँ कि यह बहुत बड़ा काम होगा फिर भी निश्चित रूप से यही हमारा एजेंडा होगा।

        साम्प्रदायिक फासीवाद के विरुध्द धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एकजुट करने का आपका यह स्वप्न दुर्गम लगता है। समतावादी समाज की स्थापना के लिए साझा आंदोलन हेतु दलित समुदाय के भीतर एवं बाहर विभिन्न तत्वों को आप संगठित कैसे करेेंगे?

        हमें देश भर में समान विचारधाराओ तथा संघ परिवार विरोधी सभी ताकतों को एक मंच पर लाना ही होगा। हम अपने आंदोलन को अलहदगी में कमजोर नहीं होने दे सकते। मैं, कन्हैया कुमार, शेहला राशिद शोरा एवं अन्य सामाजिक रूप से जागरूक दिग्गज, कार्यकर्ता, साथी इस पर पहले से ही काम कर रहे हैं। आशा है कि हम जल्द ही - हो सकता है 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले ही, इस एकता का ट्रेलर दिखाने में कामयाब होंगे।

        राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच गुजरात में सफल है। हमारे सामने और भी बड़ा कार्य है जो आसान नहीं होने वाला। अभी दलित कुछ दोषदर्शी लोगों के चंगुल में बिखरे, भ्रमित और अकेले हैं। उन्हें एक झंडे तले लाना और वर्ग दृष्टि से एक आंदोलन का रूप देना आसान काम नहीं है।

        पर हम यह करके दिखायेंगे। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक एवं आंध्रप्रदेश आदि जिन राज्यों में भी मैं गया हूँ, बहुतों ने इस काम में हमसे जुड़ने की इच्छा व्यक्त की है। हमारे दुश्मन- हिंदुत्व चालित पूंजीवाद को पराजित करने में मुझे सभी के सहयोग की आवश्यकता है।

        हमारा शत्रु पहचान लिया गया है। देश की धर्मनिरपेक्ष, जाति विहीन एवं प्रगतिशील विचारधारा के साथ समावेशी इकाई के रूप में पहचान बचाए रखने के लिए हमारे साथ जुड़े।

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        परिचय :- अभिषेक  इलाहबाद, वर्धा और सागर विश्वविद्यालय में पढ़ते रहे हैं । समाज, साहित्य और संस्कृति से जुड़े विमर्शों और हलचलों में गहरी रुचि रखते हैं । इन दिनों डॉ. हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर में हिन्दी अनुवादक के रूप में कार्य कर रहे हैं । पाठक जल्द ही 'अकार' में उनके और अनुवाद देखेंगे ।

        संपर्क :-

        मोबा   : 8989889058

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